क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

Qutub Minar History in Hindi : कुतुब मीनार एक ऐतिहासिक मीनार है जो दिल्ली में स्थित का कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक में 12 वीं सदी में शुरु करवाया था। पर उसकी मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इस मीनार को पूरा करवाया यह मीनारें लाल किले के चरण की लाल बबुआ पत्थर से बना है।

Qutub Minar History in Hindi
क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

इस मीनार की ऊंचाई लगभग 72 मीटर है। कुतुब मीनार कहां कार गोलाकार है।जो नीचे से थोड़ा और ऊपर जाकर शंकरा हो जाता है।कुतुब मीनार के ऊपर जाने के लिए मीनार के अंदर से सीढ़ियां बनी है।इस मीनार के चारों और हरा भरा बगीचा है।जो इसे देखने आए लोगों का ध्यान आकर्षित करें चाहे यह दिल्ली में स्थित बेहद आकर्षक पर्यटक स्थल है इसे देखने हर दिन लोग देश-विदेश से लाखों की संख्या में आते हैं।

249 फुट ऊंचा कुतुब मीनार भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित है।यहां भारत की सबसे ऊंची मीनार है 5 मंजिल वाली इस इमारत में पहली तीन मंजिल लाल पत्थर से बनी है।और उन यादों में संगमरमर का प्रयोग किया गया है।इस पूरी इमारत की चावट इस्लामी तरीके से की गई है। कुतुब मीनार का इतिहास इस मीनार के ऊपर नकाशी द्वारा किया गया है। यहां उत्तरी दिशा का दरवाजा एक गुप्त शिर्डी के ऊपर ले जाता है। 300 79 सीढ़ियों पर चलते हुए आप हर मंजिल के छठे पर जा सकते हैं।

11 से 99 में बादशाह कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई इस इमारत में कहीं भूकंप और बिजली के झटको का प्रकोप कहां है।1368 में इसकी पहली दो मंजिल बिजली के करंट से गिर गई थी इन्हें सुल्तान सिकंदर लोदी ने पुनः बनवाया था। 1803 में भूकंप से पूरी इमारत हिल गई थी तब ब्रिटिश सरकार ने इसे ठीक कराया था। और इसलिए आज हम उसे देख पा रहे हैं।

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क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

कुतुब मीनार पाल के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक में से एक है। यहां इंडो इस्मालिक वास्तुकला शैली की उत्कृष्ट कृति है। कुतुब मीनार भारत के दिल्ली के महरौली में स्थित है।कुतुब मीनार को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में से सूचीवध की गई है। इसे भारत का दूसरा सबसे लंबा मीनार (लगभग 72.5 मीटर) कहां जाता है।कुतुबमीनार को लाल बलुआ पत्थर का उपयोग करके बनाया था।कुतुबुद्दीन ऐबक ने है 12वीं शताब्दी में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू किया था।इनके बाद इस मीनार को उनके उत्तराधिकार इल्तुतमिश ने पूरा किया था। इस मीनार के अंदर 379 चरणों की एक शर्मीली सीढ़ी है हजारों की संख्या में पर्यटक हर साल इस मीनार को देखने के लिए दिल्ली आते हैं।

भारत की दूसरी सबसे बड़ी आकर्षक और ऐतिहासिक स्मारक कुतुब मीनार अरविंद मार्ग महरौली दिल्ली में स्थित है यहां लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग का नोट की स्थापत्य शैली में बनाई गई है।यह माना जाता है कि मुगलों ने राजपूतों पर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए इस विजई मीनार का निर्माण करवाया था इसकी दुनिया की रशीद मीनारों में नियुक्ति होती है। और विश्व धरोहर स्थलों में भी इस ज
जोडा आता है। यहां 73 मीटर आधार व्यास 2.7 मीटर सिरसी व्यास 379 सीड़िया और 5 मंजिल वाली मीनार है।

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क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

कुतुब मीनार का निर्माण qutb-ud-din युवक के द्वारा शुरू करवाया गया था। हालांकि इससे यूट्यूब मिस द्वारा पूरा किया गया। इस मीनार का निर्माण कार्य 1200 में पूरा हुआ था यह मुगल स्थापत्य कला के सबसे महान कृतियों में से एक है। जो सुंदर नक्काशी के साथ बहुत सी मंजिलों की इमारत है। यहां आकर सबको पर्यटन स्थलों में से एक है। जो हर साल एक बड़ी भीड़ को दुनिया भर के कोने से इसे देखने के लिए आकर्षित करती है।इसमें भूकंप के कारण बहुत से अविनाश को मिला है हालांकि उसी समय इसे शासकों द्वारा पुननिर्मित भी करवाया गया है।

फिरोज शाह ने इसके ऊपरी दो मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था जो भूकंप में नष्ट हो गई थी एक अन्य पूर्व निर्मित का कार्य सिकंदर लोदी ने द्वारा 1505 में और नीचे स्थित के द्वारा 1794 में मीनार के नष्ट हुए भागों में कराया गया था। एक सप्ताह के सभी दिनों में सुबह 6:00 बजे खुलती है और शाम 6:00 बजे बंद होती है। मीनार का निर्माण बहुत समय पहले लाल बलुआ पत्थरों और संगमरमर का प्रयोग करके किया गया था। इसमें बहुत बाहरी किनारे और बेलनाकार यहां घुमावदार रास्ते हैं। इसकी बालों के लिए इसकी मंजिलों को अलग करती है कुतुब मीनार की पहली तीन मंजिलों का निर्माण लाल बलुआ पत्थरों का प्रयोग करके हुआ।

Qutub Minar History in Hindi
क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

हालांकि चौथी और पांचवी मंजिल का निर्माण संगमरमर और बलुआ पत्थरों से हुआ। स्पिनर के आधार में एक कुवत— उल—इस्लाम (किसी भारत में निर्मित पहली मस्जिद माना जाता है) मस्जिद है। कुतुब परिसर में 7 मीटर की ऊंचाई वाला एक ब्राम्ही शिलालेख के साथ लोह स्तंभ मीनार की दीवारों पर कुरान (मुस्लिमों का पवित्रा पौराणिक शास्त्र) की बहुत सीआई आते भी लिखी गई है। यहां देवनागरी और अरेबिक रूप में लिखें अपने इतिहास को भी रखता है। पर्यटक ओके आ कर सकता का प्रसिद्ध स्मारक है। जिसके आसपास अन्य स्मारक भी है। प्राचीन समय से ही यह माना जाता है। कि यदि कोई व्यक्ति इसकी और पीठ करके इसके सामने खड़े होकर अपने हाथों से इस लौह स्तंभ के चक्कर लगाता है। तो उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है हर साल दुनिया भर के कोने से पर्यटक यहां इस ऐतिहासिक और अद्भुत स्मारक की सुंदरता को देखने के लिए आते हैं।

सदियों से दिल्ली के इतिहास में उनके उतार-चढ़ाव आए हैं यहां उनको राजा महाराजाओं की राजधानी रही है बहुत से मुगल सम्राट ने दिल्ली में उनके ऐतिहासिक भावनाओं का निर्माण किया है जिसमें लाल किला जामा मस्जिद मयूर का मकबरा कुतुब मीनार जैसे प्रसिद्ध है। इसमें से कुतुबमीनार का अपना रूप अलग महत्व है यहां बहुत प्राचीन इमारत है यहां भारत की सबसे ऊंची मीनार है यहां कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई थी जो 12 वीं शताब्दी में पूरी हुई थी यहां दिल्ली के लाल किले से लगभग 40 किलोमीटर दूर दक्षिण में मल्हारी के पास स्थित है।

Qutub Minar History in Hindi
क़ुतुब मीनार का इतिहास | Qutub Minar History in Hindi

इस मीनार की सातवीं मंजिल जिसमें अब केवल पांच मंजिलें है इन 5 मंजिलों तक पहुंचने के लिए 378 सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता है इसकी पांचवीं मंजिल से इस दिल्ली का सारा दृश्य देख सकते हैं पहले इस कुतुब मीनार से आत्महत्या के अनेक मामले प्रकाश में आते थे जिस कारण से आज काल भारत सरकार ने दर्शकों पर पहली मंजिल के आगे जाने पर प्रतिबंध लगा रखा है इस मीनार के आसपास पुराने समय के खंडहर चारों ओर फैले हुआ है। क्यों अपने आप में ही रुक पुरानी याद समेटे हुए हैं।

इस मीनार तथा इन खंडहरों को देखने के लिए हजारों दर्शकों देश विदेश से समय-समय पर आते रहते हैं।वह इसकी ऊंचाई तथा कलात्मक हुनर की प्रशंसा करते हैं। कुतुब मीनार के पास एक लोहे का स्तंभ में स्थित है।जिसकी विदेश बहुत प्रशंसा करते हैं इस नंबर की एक विशेषता है , कि इसे कोई भी व्यक्ति पीछे हाथ करके नहीं पकड़ सकता जिसके लिए लगभग सभी दर्शक प्रेस ना करते हैं।अतः लोग इस कारण से इसकी ओर आकर्षित होते हैं।इसमें विशेषता और भी है कि इतने वर्षों के बाद भी इस लोहे के स्तंभ को रंग नहीं लगा है।

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