स्वामी विवेकानंद – Biography , Teachings & Influence

स्वामी विवेकानंद – Biography , Teachings & Influence

स्वामी विवेकानंद : भारत में जन्मे एक मठवासी संत , एक युवा सन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगंध विदेशों में बिखरने वाले ऐसे महापुरुष थे , स्वामी विवेकानंद। “उठो जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व मत रुको” उनका ये क्रांति वाक्य आज भी युवा जन को प्रेरित करता है। संपूर्ण विश्व में हिंदू धर्म का महत्व बताने में उनका योगदान बहुत बड़ा रहा है। एक ऐसे इंसान थे जिनको पूरी दुनिया फॉलो करती थी। बहुत बड़े इंसानों ने भी स्वामी विवेकानंद से इंस्पिरेशन ली है।यह पहले इंसान थे जिन्होंने हमारे वेदों की ताकत और उपनिषदों की ताकत को पूरी दुनिया में फैला दिया। पूरी दुनिया में हिंदुत्व का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानंद पहले इंसान थे।इस आर्टिकल में हम उनके जन्म , युवा अवस्था , उनका तेज दिमाग , और कई अनजानी बाते जानने वाले हैं। आइए जानते हैं , भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर तक पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद के बारे में।

बचपन :

स्वामी विवेकानंद - बचपन
स्वामी विवेकानंदबचपन

स्वामी विवेकानंद का पूरा नाम नरेन्द्रनाथ विश्वनाथ था। इनका जन्म पश्चिम बंगाल कोलकाता में एक उदार परिवार में हुआ था। उनके नौ भाई बहन थे। उनके पिता विश्वनाथ दत कलकता हाई कोर्ट में वकालत करते थे। विवेकानंद की माता भुनेश्वरी देवी सरल एवं धार्मिक विचारों वाली महिला थी। बचपन से ही वे भगवान और अध्यात्म से जुड़े हुए थे। स्वामी विवेकानंद भगवान राम से बहुत ही प्रभावित थे। नरेन्द्र बचपन से ही शरारती और कुशाग्र बुद्धि के बालक थे उनके माता-पिता को कई बार उन्हें संभालने और समझाने में बहुत परेशानी होती थी। बचपन में उन्हें वेद , उपनिषद , भगवत गीता , रामायण , महाभारत और वेदांत अपनी माता से सुनने का शौक था और योग और कुश्ती में विशेष रूचि थी।

युवा अवस्था :

युवा अवस्था
युवा अवस्था

स्वामी विवेकानंद 1879 प्रेसीडेंसी कॉलेज जी इंट्रेस्ट एग्जाम में फर्स्ट डिवीजन लाने वाले प्रथम विद्यार्थी बने। एक अनिश्चित लड़का, नरेंद्र ने संगीत, जिमनास्टिक और पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होने तक, उन्होंने विभिन्न विषयों, खासकर पश्चिमी दर्शन और इतिहास का एक विशाल ज्ञान प्राप्त कर लिया था। एक योगिक स्वभाव के साथ जन्मे, वह अपने लड़कपन से भी ध्यान का अभ्यास करते थे, और कुछ समय के लिए ब्रह्म आंदोलन से जुड़े थे। उन्होंने पश्चिमी तर्क , जीवन ओर यूरोपी इतिहास की पढ़ाई जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूट से की। सन 1881 में उन्होंने ललित कला की परीक्षा पास की। 1884 में स्नातक की डिग्री पूरी की।

डार्विन और कई सारे महान विज्ञानिक के काम का अद्यतन कर रखा था। वे अर्बट स्पेंसर के विकास सिद्धांत से प्रभावित थे और उन्ही के जैसा बनना चाहते थे। उन्होंने स्पेंसर की किताब को बंगाली में परिभाषित किया है। जनरल असेंबली संस्था के अध्यक्ष विलियम हेस्टी ने यह लिखा था कि , नरेन्द्र सच में बहुत होशियार है। मैंने कई यात्राएं की , बहुत दूर तक गया लेकिन मैं और जर्मन विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र के सभी विद्यार्थी कभी भी नरेंद्र के दिमाग और कुशलता के आगे नहीं जा सके।

वेस्टर्न कल्चर में विश्वास रखने वाले उनके पिता विश्वनाथ दत्त अपने पुत्र को अंग्रेजी शिक्षा देकर वेस्टर्न कल्चर में रंगना चाहते थे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। नरेंद्र के पिता की 1884 में अचानक मृत्यु हो गई। साहूकार दिए हुए करजे को वापस करने की मांग कर रहे थे और उनके रिश्तेदारों ने भी उनके पूर्वजों के घर से उनके अधिकारों को हटा दिया था।

स्वामी विवेकानंद के दुर्गादत्त संस्कृत और फारसी के विद्वान थे जिन्होंने 25 वर्ष की उम्र में ही अपना परिवार और घर त्याग कर सन्यासी जीवन स्वीकारा था।

विववेकानंद का तेज दिमाग :

विवेकानंद के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं कि उनकी यादास जबरदस्त थी। बहुत ही जल्दी पूरी किताब पढ़ लेते थे। यह बात उन दिनों की है जब विवेकानंद तेज भ्रमण में थे। उनके साथ उनके एक गुरुभाई भी थे। तेज भ्रमण के दौरान जहां पर भी उन्हें ग्रंथ मिलते थे वह उन्हें पढ़ना पसंद करते थे। एक जगह पर उनको पुस्तकालय बहुत ही पसंद आया उन्होंने सोचा , कुछ दिन यहां पर रुका जाए।

उनके गुरु भाई विवेकानंद के लिए किताबें लाकर देते थे। विवेकानंद एक ही दिन में पूरी किताब पढ़ कर अगले दिन वापस कर देते थे। रोज रोज नई किताबें लाना और अगले दिन ही वापस कर देते थे। यह देख कर उस librarian ने गुरूभाई से पूछा , “क्या आप इतनी सारी किताबें के देखने के लिए नहीं जाते हैं!! , अगर आपकी है केवल देखना ही चाहते हैं तो मैं यही आपको सारी किताबें दिखा देता हूं”। लाइब्रेरियन की इस बात का उत्तर देते हुए गुरु भाई ने कहा, “हमारे गुरु स्वामी विवेकानंद सभी किताबों को बड़ी गंभीरता से पढ़ते हैं , उसके बाद ही किताब वापस लौटई जाती है। यह सुनकर लाइब्रेरियन चकित हो गया। मैं आपके गुरु विवेकानंद से मिलना चाहता हु।

अगले दिन librarian ओर स्वामीजी की मुलाकात हुई। स्वामी जी ने कहा महाश्य , आप हैरान ना हो। आपके पुस्तकालय से आई हुई सभी किताबे अच्छे से पड़ी है और सभी किताबें मुझे मुंह जवानी याद है। विवेकानंद के पास कुछ किताबे थी जो लाइब्रेरी यन को थमाई। और उन किताब में से कुछ लाइन्स हुबहु सुना दी। लाइब्रेरियन चकित रह गया ओर विवेकानंद से पूछा , “आपकी यदास का रहस्य क्या है!!”

उनके गुरु श्री रामकृष्ण ने उनका नाम विवेकानंद रखा था ; क्योंकि उसके बोध की क्षमता ही लाजवाब थी , जो उनके गुरु ने पहचान ली थी।

विवेकानंद ने उत्तर देते हुए कहा : “किसी भी चीज को बड़े फोकस के साथ , thougtless किया जाए तो वो पूरी तरह से आपकी मेमरी में स्टोर हो जाती है। अभ्यास और ध्यान करने से मन की एकाग्रता शक्ति है”। बस इसी तरह से यादस बढ़ती है

श्री रामकृष्ण के साथ :

श्री रामकृष्ण के साथ
श्री रामकृष्ण के साथ

युवा अवस्था में नरेंद्र को आध्यात्मिक संकट के दौर से गुजरना पड़ा जब उन्हें भगवान के अस्तित्व के बारे में संदेह के कारण मार दिया गया।उन्होंने पहली बार अपने कॉलेज में अपने एक अंग्रेजी प्रोफेसर से श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात करते सुना। श्री रामकृष्ण दक्षिण में काली माता के मंदिर में रहते थे। सन 1881 में एक दिन, नरेन्द्र रामकृष्ण को मिलने हेतु उसके पास गए। उनके मन में हुआ ये प्रश्न उन्होंने कई दूसरे लोगों से भी पूछा था, लेकिन किसी के पास से उनको संतोषजनक जवाब नहीं मिला। रामकृष्ण के पास जा कर अपना प्रश्न प्रस्तुत करते हुए कहा , “क्या आपने भगवान को देखा है?” क्षणिक भी देरी न करते हुए उन्होंने उत्तर देते हुए कहा : “हां, मेरे पास है। मैं जिस तरह से आपको देखता हु बिलकुल उसी तरह बहुत ही सहज अर्थ में भगवान को भी स्पष्ट रूप से देखता सकता हु।”

नरेन्द्र के मन को, श्री रामकृष्ण ने अपने पवित्र ,शुद्ध और निःस्वार्थ प्रेम से जीत लिया। इस प्रकार एक अटूट अद्वितीय गुरु-शिष्य का संबंध शुरू हुआ। जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल एवं प्रेरणादायी बना। नरेन्द्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु स्वीकार कर के अपने गुरु के मार्गदर्शन के आधीन आध्यात्मिक मार्ग पर बड़ी ही तेजी से आगे बढ़े। दक्षिणेश्वर में, नरेन्द्र ने सभी लोगो से मुलाकात ली जो श्री रामकृष्ण से प्रभावित थे। रामकृष्ण परमहंस के पास उन्हें तसल्ली मिली और उन्होंने दक्षिणेश्वर जाने का मन बना लिया। 1885 में रामकृष्ण को गले का कैंसर हो गया और नरेंद्र और उनके अन्य साथियों ने रामकृष्ण के अंतिम दिनों में उनकी सेवा की। राम कृष्ण ने अपने अंतिम दिनों में उन्हें सिखाया कि , मनुष्य की सेवा करना ही भगवान की सबसे बड़ी पूजा है। रामकृष्ण ने नरेंद्र को अपने मठ वासियों का ध्यान रखने को कहा और अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। 1886 में रामकृष्ण परमहंस का निधन हो गया।

जीवन मिशन के बारे में जागरुतता :

जीवन मिशन के बारे में जागरुतता
जीवन मिशन के बारे में जागरुतता

नए मठ की स्थापना के बाद, विवेकानंद ने अपने जीवन में एक बड़े मिशन के लिए आंतरिक आह्वान को सुना। जबकि श्री रामकृष्ण के अधिकांश अनुयायियों ने अपने निजी जीवन के संबंध में उनके बारे में सोचा, विवेकानंद ने भारत और पुरे विश्व के बारे में सोचा। वर्तमान युग में, आधुनिक दुनिया और अहम रूप से भारत देश के लिए रामकृष्ण का संदेश क्या था! इस सवाल का उत्तर ढूंढने हेतु और अपनी अंतरशक्ति को पहचानने हेतु उन्होंने पूरी दुनिया का सफर अकेले ही करने का फैसला किया। इसलिए 1890 में, रामकृष्ण की दिव्य पत्नी श्री शारदा देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद , स्वामीजी ने बारानगर मठ छोड़ दिया और संसार की लम्बी यात्रा करने हेतु निकल पड़े।

वास्तविक भारत की खोज :

पूरे भारत में अपनी यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने भारत के लोगो की भयानक गरीबी और बेरोजगारी की गहराई से जाना। वह भारत के पहले धार्मिक नेता थे, जिन्होंने यह समझा शीध्र अनगिनत भूखे लोगों को खाने और आवश्यक अन्य चीजे प्रदान करने की थी। कृषि, ग्रामोद्योग इत्यादि को बहेतर बनाया। विवेकानंद ने भारत की गरीबी की अहम् समस्या पर काबू पा लिया था। कई सालो से पीड़ित होने के बाद , दलित जनता ने अपने जीवन में काफी सुधार किया। भारत की जनता को प्रेरनादायी संबोधन की जरूरत थी , जिसको विवेकानंद ने बखूबी निभाया।अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने सभी जगह पर देखा कि, गरीबी के बावजूद , सभी लोग धर्म से जुड़े हुई है परंतु उनको कभी जीवन-दर्शन, ज्ञानवर्धक सिद्धांत नहीं सिखाए गए और न ही उन्हें व्यावहारिक जीवन में कैसे लागू किया जाए। बाद में इस कार्य को भी अंजाम दिया।

भारत की प्रजा को दो प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता थी। १) अपनी आर्थिक परिस्थिति को अच्छी करने हेतु धर्मनिरपेक्ष ज्ञान २) आध्यात्मिक ज्ञान के लिए उन पर विश्वास करना साथ ही उनकी भावना को मजबूत करना। यह दो ज्ञान को शिक्षा के माध्यम से लोगो तक पहुंचाया।

पढ़े : Essay on Mahatma Gandhi in Hindi

शिकागो धर्म परिषद :

शिकागो धर्म परिषद
शिकागो धर्म परिषद

सन 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म परिषद का आयोजन किया गया।जहा पर विवेकानंद ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया , विवेकानंद के शुरुआती संबोधन सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका कहते वहां उपस्थित विश्व के 6000 विद्वानों ने लगातार करीब 2 मिनट तक तलिया बजाई। अगले दिन के सभी अखबारों ने घोषणा की , कि विवेकानंद का भाषण सबसे सफल भाषण था। जिसके बाद सारा अमेरिका विवेकानंद और भारतीय संस्कृति को जानने लगा। इससे पहले अमेरिका पर इस तरह का प्रभाव किसी हिंदू ने नहीं डाला था। विवेकानंद 2 साल तक अमेरिका में रहे इन 2 सालों में उन्होंने हिंदू धर्म का विश्व बंधुत्व का संदेश वहां के लोगों तक पहुंचाया। अमेरिका के बाद स्वामी विवेकानंद इंगलैंड गए वहा की मार्गरेट नॉवेल उनकी फॉलोवर बनी जो बाद में सिस्टर निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुई। सन 1887 में उन्होंने राम कृष्ण मिशन स्थापना की। यह घोषित किया की , दुनिया के सभी धर्म सत्य है और वह एक ही ध्येय कि तरफ जाने के अलग अलग रास्ते है।

Swami Vivekananda Death :

4 जुलाई 1910 को स्वामी विवेकानंद ने महा समाधि लेकर अपने जीवन का त्याग किया। जिसकी भविष्य वाणी उन्होंने पहेले ही कर दी थी कि वो 40 साल से अधिक नहीं जिएंगे।अपनी मृत्यु के पहले स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही संपूर्ण भारत भ्रमण किया और एक सन्यासी जीवन जिया। अगर विवेकानंद चाहते तो अपनी पूरी जिंदगी अमेरिका , यूरोप के किसी शहर में आराम के साथ बिता सकते थे। लेकिन उन्होंने अपनी आत्मकथा में कहा है कि , मैं एक सन्यासी हूं भारत देश तुम्हारी सारी कमजोरियों के बावजूद मैं तुम्हें बहुत प्रेम करता हूं। स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

विवेकानंद के जीवन से प्रभावित हो कर कई महान हस्तियों जैसे निकोला टेस्ला , नरेन्द्र मोदी ने विवेकानंद की जीवन शैली को अपनाया और एक सन्यासी की तरह जीवन जिया। एक इंसान जिसने सारे संसार के सुख और बंधनों को तोड़ कर स्वयं को बंधन मुक्त किया। जिसका एक ही प्रेम था “उसका देश”। स्वामी विवेकानंद का जीवन मंत्र था “उठो , जागो और तब तक रुको नहीं जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए”।

स्वामी विवेकानंद का विश्व संस्कृति में योगदान :

  • धर्म की अनोखी समझ: आधुनिक दुनिया में स्वामी विवेकानंद के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक धर्म है, जो पारलौकिक वास्तविकता के सार्वभौमिक अनुभव के रूप में धर्म की व्याख्या है, जो सभी मानवता के लिए सामान्य है। स्वामीजी ने आधुनिक विज्ञान की चुनौती को दिखाते हुए कहा कि धर्म उतना ही वैज्ञानिक है जितना विज्ञान; धर्म ‘चेतना का विज्ञान’ है। जैसे, धर्म और विज्ञान एक दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि पूरक हैं।
  • यह सार्वभौमिक गर्भाधान धर्म को अंधविश्वास, कुत्तेवाद, पुजारी और असहिष्णुता की पकड़ से मुक्त करता है, और धर्म को सर्वोच्च स्वतंत्रता और सर्वोच्च ज्ञान, सर्वोच्च ज्ञान की खोज – सर्वोच्च पीछा बनाता है।
  • नैतिकता और नैतिकता का अनोखा सिद्धांत: व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन दोनों में प्रचलित नैतिकता, ज्यादातर भय पर आधारित है – पुलिस का डर, सार्वजनिक उपहास का डर, भगवान की सजा का डर, कर्म का डर, और इसी तरह। नैतिकता के वर्तमान सिद्धांत यह भी स्पष्ट नहीं करते हैं कि एक व्यक्ति को नैतिक क्यों होना चाहिए और दूसरों के लिए अच्छा होना चाहिए। विवेकानंद ने आत्मीयता की पवित्रता और पवित्रता के आधार पर नैतिकता का नया सिद्धांत और नैतिकता का नया सिद्धांत दिया है। हमें शुद्ध होना चाहिए क्योंकि पवित्रता हमारा वास्तविक स्वभाव है, हमारा सच्चा दिव्य स्व या आत्मन। इसी तरह, हमें अपने पड़ोसियों से प्यार करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए क्योंकि हम सभी परम आत्मा में एक हैं जिन्हें परमात्मन या ब्राह्मण कहा जाता है।
  • इस आर्टिकल की सभी फोटोज गूगल पर से ली गई हैं।

मेरा नाम निश्चय है। में इसी तरह की हिंदी कहानिया , हिंदी चुटकुले और सोशल मीडिया से संबंधित आर्टिकल लिखता हु। यह आर्टिकल “स्वामी विवेकानंद – Biography , Teachings & Influence” अगर आपको पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करे और हमे फेसबुक इंस्टाग्राम आदि में फॉलो करे।

धन्यवाद ❤️

Leave a Comment